कुछ वक़्त आज मिला, सोचा इसमें कुछ पल बटोर लूँ...
उस वक़्त में कुछ सांसें दिखीं, सोचा इनमे कुछ ज़िन्दगी सवांर लूँ;
उस ज़िन्दगी में इक शाम दिखी, सोचा इसमें कुछ रंग भर लूँ:
उन रंगों में कुछ लाल थे, कुछ हरे , और कुछ गुलाबी...
सोचा उनमे कुछ अर्थ निकाल लूँ !!
हर रंग की अपनी कुछ बात थी, थे कुछ किस्से जुडे, कुछ जुड़ते गए...
हर रंग की थी आभा अलग सी, फिर भी कुछ जुडी सी, आपस में...
हर आभा में इक सुकून सा था , अपना ही सा;
उस सुकून में एक संगीत था, कुछ बहका सा...
कुछ धुन थीं , कुछ सुर थे, कुछ थमे, कुछ बहके से...
कुछ सुनी, कुछ अधसुनी... और कुछ अनसुनी;
ये धुन जो चलती थी छाया की मंथर गति से,
औ ये छाया जो कुछ पुराने किस्से लिए थी,
ये किस्से जो कि अपना सा कुछ अर्थ लिए थे;
ये छुपे-खुले अर्थ जिनमे इस रंग भरा था,
औ ये रंग जो की शामों का साकी बने थे,
अपनी ये शाम जो की ज़िन्दगी का आइना सी थी,
ज़िन्दगी जो थमती-चलती साँसों की मोहताज़ थी,
फिर ये सांसें, जो हर पल आती थीं ... जाती थीं ...
ये पल, जो कि हिस्सा थे इस वक़्त का,
औ ये वक़्त, जो चला जा रहा था...
इन सब को लिए, अपने में समेटे ...
ये पल... ये सांसें... ये ज़िन्दगी...
ये शामें... ये रंग... ये अर्थ...
ये किस्से... ये आभा... ये सुकून...
ये संगीत... ये धुन... ये सुर...
ये छाया... ये शाम... और फिर से ये वक़्त...
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