मैंने ये तो नहीं माँगा था?
आता हूँ मैं जहाँ से,
वहां कल-कल तो था,
रट-रट तो थी,
चह-चह तो थी,
सर-सर तो थी,
छन-छन तो थी,
हर्र-हुर्र तो थी,
हश-हुश तो थी,
कुछ इशारा सा करती सीटियाँ भी थी,
मन को मोहती वीथियाँ भी थी,
अंतरतम में छुपी, कुछ कम ही व्यक्त, प्रीतियाँ भी थी,
दैनिक क्रियाओं सी निर्बाध रीतियाँ भी थी...
हाँ, वहां घर कच्चे थे,
सडकें टूटी थी,
कपड़ो पर 'टैग' नहीं लगे थे,
इस्त्री, माड़ और कलफ का झंझट तो नहीं ही था,
चंचला विद्युत् ना थी,
पहियों में हवा भी शायद कम थी!!
फिर, माँगा मैंने 'और' ...
आ गया हूँ अब मैं यहाँ,
जहाँ कल-कल तो है, पर बहते पानी का नहीं।।
जहाँ रट-रट तो है, पर उस ओस वाली सुबह की बत्तख का नहीं।।
जहाँ चह-चह तो है, पर उन उन्मुक्त पंछियों का नहीं।।
जहाँ सर-सर तो है, पर उस मदमाती पवन की नहीं।।
जहाँ छन-छन तो है, पर किसी नवयौवना की नयी पायल की नहीं।।
जहाँ हर्र-हुर्र तो है, पर खेत और रहट के बैलों के लिए नहीं।।
जहाँ हश-हुश तो है, पर खेतो और आंगनो से अनाज चुगती चिड़ियों के लिए नहीं।।
जहाँ कुछ इशारा सा करती सीटियाँ भी हैं, पर पुराने वाले बाग़ से किसी को बुलाने को नहीं।।
जहाँ मन को मोहती वीथियाँ भी हैं, पर मोहना ही मात्र एक उनका ध्येय नहीं।।
जहाँ अंतरतम में छुपी, कुछ कम ही व्यक्त प्रीतियाँ भी हैं,
पर शायद उतनी निश्छल नहीं।।
जहाँ दैनिक क्रियाओं सी निर्बाध रीतियाँ भी हैं, पर प्रेरित हैं वह किसी अन्य ही लक्ष्य की ओर।।
हाँ, वहां घर पक्के है...
सडकें मज़बूत सी दिखती हैं...
कपड़ो पर 'टैग' अवश्यम्भावी हैं...
इस्त्री, माड़ और कलफ तो माथे के सिन्दूर से ज्यादा ज़रूरी हो चुके हैं,
जहाँ चंचला विद्युत् तो बायें हाथ की अंगूठी सी है,
और पहियों में हवा कम होने का तो सवाल ही नहीं...
अब असमर्थ हूँ सोच पाने में...
कि क्या सचमुच मैंने 'यही' माँगा था??
https://www.facebook.com/notes/deepak-s-salhipore/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%A5%E0%A4%BE/752793914733178
आता हूँ मैं जहाँ से,
वहां कल-कल तो था,
रट-रट तो थी,
चह-चह तो थी,
सर-सर तो थी,
छन-छन तो थी,
हर्र-हुर्र तो थी,
हश-हुश तो थी,
कुछ इशारा सा करती सीटियाँ भी थी,
मन को मोहती वीथियाँ भी थी,
अंतरतम में छुपी, कुछ कम ही व्यक्त, प्रीतियाँ भी थी,
दैनिक क्रियाओं सी निर्बाध रीतियाँ भी थी...
हाँ, वहां घर कच्चे थे,
सडकें टूटी थी,
कपड़ो पर 'टैग' नहीं लगे थे,
इस्त्री, माड़ और कलफ का झंझट तो नहीं ही था,
चंचला विद्युत् ना थी,
पहियों में हवा भी शायद कम थी!!
फिर, माँगा मैंने 'और' ...
आ गया हूँ अब मैं यहाँ,
जहाँ कल-कल तो है, पर बहते पानी का नहीं।।
जहाँ रट-रट तो है, पर उस ओस वाली सुबह की बत्तख का नहीं।।
जहाँ चह-चह तो है, पर उन उन्मुक्त पंछियों का नहीं।।
जहाँ सर-सर तो है, पर उस मदमाती पवन की नहीं।।
जहाँ छन-छन तो है, पर किसी नवयौवना की नयी पायल की नहीं।।
जहाँ हर्र-हुर्र तो है, पर खेत और रहट के बैलों के लिए नहीं।।
जहाँ हश-हुश तो है, पर खेतो और आंगनो से अनाज चुगती चिड़ियों के लिए नहीं।।
जहाँ कुछ इशारा सा करती सीटियाँ भी हैं, पर पुराने वाले बाग़ से किसी को बुलाने को नहीं।।
जहाँ मन को मोहती वीथियाँ भी हैं, पर मोहना ही मात्र एक उनका ध्येय नहीं।।
जहाँ अंतरतम में छुपी, कुछ कम ही व्यक्त प्रीतियाँ भी हैं,
पर शायद उतनी निश्छल नहीं।।
जहाँ दैनिक क्रियाओं सी निर्बाध रीतियाँ भी हैं, पर प्रेरित हैं वह किसी अन्य ही लक्ष्य की ओर।।
हाँ, वहां घर पक्के है...
सडकें मज़बूत सी दिखती हैं...
कपड़ो पर 'टैग' अवश्यम्भावी हैं...
इस्त्री, माड़ और कलफ तो माथे के सिन्दूर से ज्यादा ज़रूरी हो चुके हैं,
जहाँ चंचला विद्युत् तो बायें हाथ की अंगूठी सी है,
और पहियों में हवा कम होने का तो सवाल ही नहीं...
अब असमर्थ हूँ सोच पाने में...
कि क्या सचमुच मैंने 'यही' माँगा था??
https://www.facebook.com/notes/deepak-s-salhipore/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%A5%E0%A4%BE/752793914733178
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