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Monday, 1 December 2014

सूर्य नया उगा लो तुम

सूर्य नया उगा लो तुम!!

घोर निराशा के तिमिर को, 
बस धुंध समझ धकेलो तुम,
विकट कितना भी हो जीवन,
इसकी गिरहों को खोलो तुम!

बस घुमा के देखने से बदलती है ये दुनिया,
बस एक बार, किरदार बदल के खेलो तुम,
ये ऊपर-नीचे, काले-गोरे में बाँट दिया किसने तुमको?
बस एक गागर में सब को डाल, घोंट के देखो तुम!

आयें लहरें, जाएं लहरें, भयभीत ना होना मित्र मेरे,
चढ़ा बाहें, साहस बटोर, बस नाव अपनी खे लो तुम,
चक्र है ये, ये चलता रहेगा, फसना ना तुम इसके जाल में,
दे सपनो को पंख नए, दुनिया अपनी संजो लो तुम!

देर नहीं है, देर नहीं, ये रुत बदलेगी,
छटेंगे बादल, आकाश खुलेगा,
आने वाले उस बसंत के,
स्वागत को कस लो कमर को तुम!

मरुस्थल हो या कि हिमनद,
आधिक्य तुम्हे ना छू पाए,
विरक्त कर खुद को, योगी बन कर,
सूर्य नया उगा लो तुम!

विरक्ति ही नहीं सूत्र एक मात्र,
वैराग्य भी नहीं कुछ सुगम,
सब धर्मों का पालन कर के,
स्वार्थ-साधना कर लो तुम!

स्वार्थ नहीं कोई निन्द्य अवधारणा,
बस थोड़ा संतुलन अवश्य हो,
जब सध जाए वो तो समझो,
लक्ष्य के बहुत समीप हो तुम!

चंवर का काम है डोलना,
साकी मदिरा पिलाने को है,
इन सब से बस थोड़ा ऊपर उठ कर,
सिंघासन को तौलो तुम!!

https://www.facebook.com/notes/deepak-s-salhipore/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A5%8B-%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE-/915613108451257

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