ये दो चित्र, चित्र मात्र नही, अपितु एक ग्रन्थ है।
इसमें भारतीय वायु सेना के वीरगति को प्राप्त एक स्क़वाड्रेन लीडर की पत्नी (विधवा की संज्ञा से हमें परहेज़ है) और अन्य परिवारीजन हैं।
ये वायुसेना की वर्दीधारी महिला जो कि आरती हैं, हाल ही में जम्मू-काश्मीर के बड़गाम में शहीद हुए स्क़वाड्रेन लीडर सिद्दार्थ वशिष्ठ की पत्नी होने के साथ ही (या पहले कहना बेहतर होगा) स्वयं उसी भारतीय वायु सेना में स्क़वाड्रेन लीडर भी हैं।
अपने दिवंगत पति की अन्तिम विदाई का समाचार सुनकर जहाँ किसी भी महिला के पाँव काँप उठेंगे और हृदय फटने को होगा, इन्होंने अदम्य साहस और धैर्य का परिचय दिया।
ये उस दुर्घटना के समय छुट्टी पर गुरुग्राम में थीं, यानी अपनी आधिकारिक सेवा में रत नही थीं या यूँ कहिये कि 'ऑफ-ड्यूटी' थीं। अपने दिवंगत पति को अन्तिम विदाई देने आते वक़्त जहाँ अन्य किसी महिला को अपनी वेश-भूषा का ध्यान न रहता और कइयों को तो शायद अपने नाम तक की सुध न रहती, वहीं ये उन्हें विदा करने के लिये आते समय उनकी राष्ट्रसेवा, वीरता और साहस का समुचित सम्मान रखते हुये अपनी वर्दी में आयीं।
एक चित्र में जहाँ एक अनन्य रूप से शांत और गंभीर वायु सेना की अधिकारी सी दिख रही हैं, वहीं दूसरी तस्वीर में वह फूट-फूट कर बिलखती हुई भी।
एक ओर वह शौर्य और पराक्रम की प्रतिमूर्ति सी दृढ़ दिख रही हैं, वही दूसरी ओर उनके अन्दर की करुणा और स्नेह मुखर है।
एक ओर जहाँ वह निर्भयता की एक अडिग छवि सी हैं तो वहीं दूसरी में वह वात्सल्य का मानसरूप भी हैं।
एक ओर जहाँ उनकी कर्तव्यनिष्ठा परिलक्षित होती दिख रही है, वहीं दूसरी ओर एक समर्पित पत्नी अपने विह्वल विलाप को रोकने का प्रयास तक नहीं करती।
एक ओर जहाँ एक वायु सेना की एक अधिकारी अपने साथी वीर सैनिक को सलाम करती है, ठीक वहीं एक पत्नी अपने सद्य एकाकीपन को भाँपते हुए बिलख पड़ती है।
एक ओर आँखों में दृढ़निश्चयता के साथ तिरंगा सीने से लगा हुआ है तो वहीं दूसरी ओर झुके हुए कन्धे उनके उस क्षण में उठ रहे मनोभावों का प्रतीक से बने हैं।
यह सब और ना जाने क्या-क्या है जो इस देश की मिट्टी में उपजता है। यह ऐसी महिलायें ही हैं जो वीरों को जनती हैं। ये उन्हें एक वीर बनने देती हैं; उन्हें गढ़ कर कुशल बनाती हैं। और जब आवश्यकता हो तो उनका सगर्व अभिषेक करती हैं।
पुरुषों का शौर्य मात्र उनके बाहुबल से नहीं, बल्कि उस आत्मशक्ति से भी है जो उन्हें इस प्रकार की महिलाओं से जन्म से, सम्पर्क से, साथ से मिलता है।
ये महिलायें ही रही हैं जो गाँधी को 'महात्मा' और सुभाष को 'नेता जी' बना देती हैं।
ये आरती ही हैं जो एक सिद्धार्थ को अमर कर देती हैं।
इनके अडिग साहस और अदम्य शौर्य को नमन। 🙏
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