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Wednesday, 4 October 2017

हम...

ये भीड़ मुझे छोटा महसूस कराती है,
विशाल सा होता हूँ जब  स्वयं के साथ होता हूँ।
ये भीड़ मुझे ध्वंस का आभास कराती है,
सृजन सा होता हूँ जब एकांत में होता हूँ।
ये जन मुझे सूक्ष्मता का भान देते हैं,
वृहद् सा होता हूँ, जब भी एकल  होता हूँ।
ये भीड़ एक शून्य का आकार लेती है,
और अकेलापन एक अनन्यता दे जाता है।
कुछ अधूरा सा रह जाता है जब उस काफिले में चलता हूँ,
जब बियाबां में  होता हूँ, मुकम्मल सा होता हूँ।
हर जलसे में एक कमी सी दिखती है,
जो अकेला होता हूँ, मक़बूल होता हूँ।

... और इन सब से परे,
जब तुम्हारे साथ होता हूँ,
ख़ुद को पा लेता हूँ,
जी उठता हूँ,
वृहद्-विस्तृत-विशाल होता हूँ।

तुम्हारी आँखों का वो झपकना रात होता है,
तुम्हारा वो जान के ना मुस्कुराना एक खेल,
तुम्हारा वो दूसरी ओर तकते रहना एक बेचैनी,
और तुम्हारा वो  बेफ़िक्र बैठना एक सुकूँ।

वो बेलौस रवैया एक हौसला देता है,
और हलकी नाराज़गी अपनेपन का एहसास,
तुम्हारा वो यकायक चुप हो जाना  बेकल कर जाता है,
और फिर पलट कर देखना जिला देता है।

जब भीड़ में होता हूँ,
तो शायद नहीं होता हूँ।
जब अकेला होता हूँ,
ख़ुद को पा लेता हूँ।
जब तुम्हारा साथ होता है,
जी उठता हूँ...
ख़ुद को महसूस कर पाता हूँ,
मैं से हम हो जाता हूँ,
और इस तरह,
उस सूक्ष्मता से विस्तार पाता हूँ,
वृहद्-विस्तृत-विशाल हो जाता हूँ...
फिर मैं से हम हो जाता हूँ,
हाँ  मैं,  मैं से हम हो जाता हूँ...

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