~ सपने ! ~
क्या आपने कभी किसी को मरते देखा है?
उसको व्यक्तिगत रूप से जानते हों या ना जानते हों, पर दुःख तो ज़रूर होता होगा |
दुःख उसकी मृत्यु का
होता है या उस व्यक्ति के अस्तित्व के मिट जाने का, अंतर कर पाना मुश्किल है|
शायद व्यक्ति के अस्तित्व
खत्म होने का दुःख होता होगा|
दुःख शायद उस शून्य
का जो उस व्यक्ति के जाने के बाद प्रतीत होता है|
वह शारीरिक या भौतिक
अस्तित्व जो अब तक सामने था, मिट गया; और
समस्या अब यह है कि उसका कोई विकल्प उपलब्ध नहीं|
दुःख भी शायद इसी
बात का ज्यादा होता है|
ये तो हुई किसी
व्यक्ति की मृत्यु की बात| यहाँ शरीर था,
तो उसके ना रहने पर कमी भी महसूस हुई और दुःख भी हुआ|
पर क्या कभी आपने
सपनों को मरते देखा है?
सपने जब मरते हैं,
तो ना तो कुछ टूटता हुआ दिखता है, ना ही मरता हुआ| और ना ही कोई आवाज़ होती है|
ना तो सपनों की
अस्थियाँ बचती हैं और ना ही उनके फूलों को नदी में प्रवाहित करने
का प्रचलन है|
सपना क्या है, एक
भाव मात्र है, जिसके ना रहने पर एक अभाव
रह जाता है, जो हमेशा के लिए सालता रहता है|
उस सपने के पूरा ना
होने या मर जाने पर उत्पन्न होने वाला अभाव|
सपनों की कोई जीवन
रेखा नहीं होती और ना ही समाप्ति की सूचना|
वो तो बस उन पहियों की तरह
हैं जिनमें वक़्त-वक़्त पर जितनी हवा भरोगे वो आगे बढ़ने में उतने ही उपयोगी
रहेंगे|
... तो इस से पहले
कि सपना बूढा हो जाए, पूरा न हो सकने की स्थिति में आ जाए या फिर मर ही जाए; जी लो
उस सपने को|
उठो और पूरा कर लो
उस सपने को जो कहीं दबा-दुबका बैठा है इस तमाम संसारिकता और सामाजिकता के बोझ तले|
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