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Sunday, 23 April 2017

सपने !

~ सपने ! ~

क्या आपने कभी किसी को मरते देखा है?

उसको व्यक्तिगत रूप से जानते हों या ना  जानते हों,  पर दुःख तो ज़रूर होता होगा |

दुःख उसकी मृत्यु का होता है या उस व्यक्ति के अस्तित्व के मिट जाने का,  अंतर कर पाना मुश्किल है|

शायद व्यक्ति के अस्तित्व खत्म होने का दुःख होता होगा|
दुःख शायद उस शून्य का जो उस व्यक्ति के जाने के बाद प्रतीत होता है|

वह शारीरिक या भौतिक अस्तित्व जो अब तक सामने था, मिट गया;  और समस्या अब यह है कि उसका कोई विकल्प उपलब्ध नहीं|
दुःख भी शायद इसी बात का ज्यादा होता है|

ये तो हुई किसी व्यक्ति की मृत्यु की बात|  यहाँ शरीर था, तो उसके ना रहने पर कमी भी महसूस हुई और दुःख भी हुआ|  


पर क्या कभी आपने सपनों को मरते देखा है?

सपने जब मरते हैं, तो ना तो कुछ टूटता हुआ दिखता है, ना ही मरता हुआ|  और ना ही कोई आवाज़ होती है| 

ना तो सपनों की अस्थियाँ  बचती हैं  और ना ही उनके फूलों को नदी में प्रवाहित करने का प्रचलन है|

सपना क्या है, एक भाव मात्र है,  जिसके ना रहने पर एक अभाव रह जाता है, जो हमेशा के लिए सालता रहता है|

उस सपने के पूरा ना होने या मर जाने पर उत्पन्न होने वाला अभाव|

सपनों की कोई जीवन रेखा नहीं होती और ना ही समाप्ति की सूचना|  वो तो बस उन  पहियों की तरह हैं  जिनमें  वक़्त-वक़्त पर जितनी  हवा भरोगे वो आगे बढ़ने में उतने ही उपयोगी रहेंगे|


... तो इस से पहले कि सपना बूढा हो जाए, पूरा न हो सकने की स्थिति में आ जाए या फिर मर ही जाए; जी लो उस सपने को|


उठो और पूरा कर लो उस सपने को जो कहीं दबा-दुबका बैठा है इस तमाम संसारिकता और सामाजिकता के बोझ तले|

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