भाई, तुम जो ये बार-बार सर उठाते हो ना तो हमें अपने गाँव की इस पगडण्डी की याद आती है| नहीं, इसलिए नहीं की तुम इस लोकतंत्र को कहीं से कहीं ले जाने में सार्थक सिद्ध होगे, वो तो देखो होना है नहीं, तुम्हे भी पता है| बल्कि इस बीच की हरी पट्टी की तरह ही लगते हो|
अरे नहीं, फिर गलत समझे यार! सुन्दरता का तुमसे कहाँ दूर-दूर का कोई वास्ता?
हरी पट्टी इसलिए कि तुम बीच में उग आते हो, गाहे-बगाहे; और अपने इस मोहक रंग से ठीक-ठाक आकर्षित भी करते हो| जब भी अनुकूलता की बयार चलती है या किसी चिर-प्रतीक्षित अवसर की बूँदें बरसती हैं तो तुम स्वाति नक्षत्र के चातक की तरह चहकते हुए अवतरित हो जाते हो| नहीं, तुम्हारे वक़्त-बेवक्त उभरने से या बेमसरफ़ का वज़ूद होने से कोई आपत्ति नहीं हमें | दिक्कत सिर्फ इतनी सी है कि तुम्हारे इस उभर आने से इस पगडण्डी पे सदियों से चले आ रहे निर्द्वन्द्व भाव से रह रहे लोगों को चलने-फिरने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है|
मतलब ये कि यदि तुम खेत के बगल वाली झाड़ की तरह किनारे उगो तब तक तो सहनीय हो| पर जब तुम ये बीच में सर उठाते हो न, असहनीय हो जाते हो| आने-जाने वालों को दिक्कत होती है, उनका संतुलन बिगड़ता है; अब वो चाहे बोलें या फिर ना बोलें|
तुम जब तक किनारे हो, इस लोकतंत्र की सीमाएं तय कर रहे हो तब तक तुम्हारी प्रासंगिकता बनी हुई है| तुम्हारी ये रही-सही सार्थकता किनारे तक ही बेहतर है| फिर बिना किसी प्रयोजन के बीच में उग आना बेवजह ही हुआ ना|
नहीं, तुम्हे कुकुरमुत्ता भी नहीं कह सकते| कुकुरमुत्ता भी कुछ काम आता है अगर ज़हरीला ना हो तो|
पर तुम, तुम तो मियाँ बस संतुलन बिगाड़ कर, चीज़ों को खतरे में डालने के अलावा जैसे कुछ जानते ही नहीं|
तो मेरे परमप्रिय, थोड़ा शर्म करो और किनारे रहो, ना लात खाओगे, ना ही सर उठाने पे काटे जाओगे|
इस सुन्दर से, बड़ी मेहनत से पाए और संजोये हुए लोकतंत्र को सांस लेने दो मित्र|
हाँ, तुम्हारी सहभागिता आवश्यक है| और उपस्थिति दर्ज़ करवाना भी| पर उसे इस लोकतंत्र की हद तक रहने दो| बीच में बिला-वज़ह उगोगे तो शर्तिया या तो ऊपर से कोई चलेगा, थूकेगा या फिर बच के निकलेगा|
इस से तुम भी वाकिफ़ ही होगे कि इस मौके की अनुकूलता की छुटपुट बूंदों के जाने के बाद तुम्हारा अस्तित्व स्वयं मिट जाना है| तो जब तक हो, शांति से किनारे रहो और इस राष्ट्र और इसके लोकतंत्र को भी सांस लेने दो|
करबद्ध आभार !!
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Monday, 6 March 2017
पगडण्डी , लोकतंत्र की|
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